शक्करपारे की महक से घर भर रहा था ये हर साल तुम्हारे वापस लौटने की आहट देता तुम आते तो समुन्द्र में नमक सा घुलता मेरा मन धुप में इन्द्रधनुष सी अचानक दिखती थी मेरी हँसी तुम्हारे होने की नक्काशी मेरे नब्ज़ में महसूस होती आज फिर महक, आहट, घुलना, हँसी, नक्काशी साथ है पर, मेरी काया के सावलेपन में, सिर्फ तुम्हारी परछाई बाकी है
ज़िन्दगी का घना कोहरा छट जाता है जब आती हो तुम, अपनी धूप सी साड़ी मैं छाव लिए कंगन का खनकना और पायल का छनकना ये सब तो आम बातें है, तुम आती हो तो, थिरकती है यह हवा,सोख लेते है फूल तुम्हारी खुशुबू, हिरन की नाभी में छिपी कस्तूरी सी बिखरती हो हर ओर,खुद से बेखबर
Comments
Post a Comment